top of page
landscape with rainbow wide angle not very bright_edited_edited.jpg

Navigating the highs that elevate our spirits and the lows that test our resilience.

आत्मसात / सूरजमुखी 

 

कभी यूं होता है कि जीवन के किसी बेहतरीन दौर से गुजरते हुए, वर्तमान की सच्चाई और भविष्य के सपनों के बीच किसी खूबसूरत बिन्दु पर खड़े, हमारे मन में ज़िंदगी की एक परिपूर्ण तस्वीर बनती है। इस तस्वीर में दूर तक फैली ज़मीन के ऊपर होता है एक अंतहीन आसमान। सूरज की किरणों में चमकते हुए उस नीले आसमान में हमारे ख्यालों के आज़ाद पंछी उड़ान भरते हैं। ज़मीन पर सूरजमुखी के हजारों फूल खिलते हैं। तरह-तरह के कई फूलों की महक आपस में घुलकर वातावरण को और खुशनुमा बना देती हैं। उस नीले आसमान में तब बादलों का नामोनिशान नहीं होता। गुमान होता है कि समय के साथ वातावरण में ये खुशबू और फैलेगी, मौसम और सुहाना होगा और इन सबके साथ वो उड़ान और ऊंची होगी, जिस पर अभी-अभी हमने भरोसा और गर्व करना बस शुरू ही किया है। 

इस परिपूर्ण तस्वीर से परे, वास्तविक जीवन में यूं भी होता है कि एकाएक कभी उस नीले आसमान में  क्षितिज की दूसरी ओर से कुछ काले बादल आते हुए दिखते हैं। आसमान का वो नीला रंग खोने लगता है और देखते ही देखते सूरज इन बादलों के पीछे कहीं छुपने लगता है। अंधेरा छाता है और तब तेज़ बारिश होती है।  कुछ दिन यूँ ही रहते हैं लेकिन अंततः बारिश थमती है। कुछ रोशनी होती है तब मालूम पड़ता है कि उस तेज़ बारिश के बाद वो हजारों सूरजमुखी मुरझा गए हैं। वातावरण में फैली महक तूफानी हवाओं में घुल कर कहीं और उड़ चली होती है। आसमान अब भी बादलों से ढका होता है।

 

तब एक ओर वो खूबसूरत तस्वीर होती है और एक ओर वास्तविकता - दोनों परस्पर विपरीत। तब हम समझते हैं कि कैसे जो तस्वीर हमने कभी बनाई थी उसमें सूरज हमेशा दिखता था पर असल ज़िन्दगी में इसे छिपना भी होता है। असल ज़िन्दगी में कभी अँधेरा भी होता है और निराशा भी। 

 

समय के आगे बढ़ने के साथ ज़िंदगी के और पड़ाव सामने आते हैं। इस दौरान शायद पहली बार हम ज़िंदगी के पड़ावों और प्रकृति की ऋतुओं में कुछ समानता पाते हैं।

इस बीच दूर कहीं सूरज फिर से उग चुका होता है लेकिन ये तय नहीं होता कि जिस बिन्दु पर हम थके, हारे बैठे हैं, वहाँ रोशनी कब आएगी। कभी-कभी उस अँधेरे में कुछ देर और रुकना होता है या फिर भाग कर पहुँच जाना होता है उस ओर जहाँ सूरज निकलने से पहले की लालिमा आसमान में फूट चुकी है। पहले विकल्प में अपने आप से किसी तरह का समझौता नहीं होता। लेकिन अपने विश्वास पर बने रहना अक्सर मुश्किल होता है। दूसरे विकल्प में इंतज़ार कम है और अंधेरे से बाहर निकालना भी तय है। लेकिन अपना एक हिस्सा वहीं छोड़ कर उस रोशनी के पास भागते हुए अपने आप से कुछ दूर हो जाने की भी बहुत संभावना है। इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर हम क्या करना चाहते हैं, ये हम खुद तय करते हैं।  

मैं पहले विकल्प से ज़्यादा इत्तफाक रखता हूँ, इसलिए मैं मानता हूँ कि धीरे धीरे ही सही, प्रामाणिकता बनाए रखते हुए यथार्थ को आत्मसात कर लेने से आसमान के जिस हिस्से के नीचे हम हैं, एक दिन लालिमा यहीं फूटेगी। यहीं एक नया सूर्योदय होगा। सूरजमुखी के मुरझाए फूलों के पास ही नई कलियाँ खिलेंगी। बंजर हुआ मैदान फिर से एक हरे-भरे बागान की शक्ल लेने लगेगा। यहीं खिली धूप में हल्की बारिश भी होगी। इन्हीं हवाओं में गीली मिट्टी की खुशबू की ताज़गी भी घुलेगी और शायद एक बेहद खूबसूरत इंद्रधनुष भी यहीं निकलेगा, जिसकी आज हम कल्पना भी नहीं करते। 

 

उगते हुए सूरत की सुनहरी किरणों में खुद को समेट कर तब हम उठ खड़े होंगे और पाएंगे कि सूरजमुखी के वो हजारों फूल अब हमारी ओर उन्मुख हैं। 

***

© Sanjay Makhijani

bottom of page