SANJAY MAKHIJANI
People, Place & Beyond

सीमितता और स्वीकार्यता
आज ज़िंदगी में संभावनाएं जितनी बढ़ी हैं, रोजमर्रा की ज़िंदगी में भटकाव भी उतने ही बढ़े हैं। ऐसे में अगर कुछ कम हुआ है तो वो है जीवन को भोगने की हमारी क्षमता। पहले जीवन में संभावनाएं और वैभव आज से काफी कम होने पर भी आनंदित रहने की क्षमता काफी ज्यादा थी। यहाँ ‘पहले’ का अर्थ दो -तीन दशकों पहले से नहीं, बल्कि सिर्फ पाँच-सात साल पहले से है। तब से अब तक इस छोटी अवधि में बहुत तेज गति से बदलाव हुए हैं जो भटकावों में तब्दील होते चले गए। पीछे देखने पर कुछ बातें, कुछ बदलाव साफ नजर आते हैं जिनसे भटकाव हुआ है। मेरी समझ से जो दो बातें पहली थी और अब नहीं हैं, वो हैं ‘सीमितता’ और ‘स्वीकार्यता’। इन दोनों के न होने से कर्ता भाव भी बहुत कम था। अब सीमितता और स्वीकार्यता लगभग नदारद हैं और उनके खाली स्थान को भरने की कोशिश हम अपने-अपने ‘कर्ता भाव’ से कर रहे हैं। लेकिन ये कोशिश अक्सर कोशिश ही रह जाती है।
तब सीमितता की स्वीकार्यता थी, अब असीमित संभावनाओं की तलब है। ये तलब कई बार छटपटाहट की हद तक पहुँच जाती है और कुछ खास पा लेने पर भी पूरी नहीं होती। किसी कारणवश हम उस “खास” के होने पर भी उसे पूर्णतः महसूस नहीं कर पा रहे। क्योंकि जब हम उस ‘कुछ खास’ को भोगना शुरू ही कर रहे होते हैं, तब असीमितता के अथाह सागर में से एक और संभावना सतह पर आती दिखती है। ख्वाहिशें तो पहले से कहीं ज्यादा अब पूरी हो रही हैं, लेकिन ख्वाहिशों के पूरा होने पर भी हम तृप्त नहीं हो पा रहे। अंदर ही अंदर इससे हम खीजते भी हैं लेकिन उस खीझ को सतह पर लाने से कतराते हैं। यह द्वंद समय के साथ और तीव्र होता जा रहा है लेकिन हम उसे अनदेखा कर रहे हैं। अंततः तृप्त महसूस करना- एक हद तक यही जीवन की सफलता और असफलता के मायने हैं। और इसके न होने से जीवन पूर्ण होते हुए भी अपूर्ण लगता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज यही हमारी व्यथा है।
जीवन के सही मायने क्या हैं, इस पर लाखों किताबें लिखी जा चुकी हैं। यूट्यूब पर लाखों ऐसे वीडियोज़ हैं जो आपको एक बेहतर जीवन जीने के नुस्खे बताते हैं। इन सब में लिखी गई, कही गई बातें सही भी हैं। लेकिन ये सब इतनी तादाद में हैं कि बहुत संभव है कि हम इन्हीं में उलझ कर रह जाएं और अंततः अपने मूल सवालों को भूल जाएं। आज के दौर में सबसे बड़ी चुनौती अपने सवालों पर बने रहने की है। जवाब पाने की प्रक्रिया तो उसके बाद शुरू होती है।
जीवन के वर्तमान चरण में जो घट रहा है, उससे जुड़े हमारे छोटे-बड़े कई सवालों और असंख्य विचारों के पीछे का मूल सवाल क्या है, ये हम नहीं समझते या नहीं समझना चाहते। आज हममें से अधिकांश (खासकर जो 25 से 40 वर्ष की आयु के बीच हैं) का मूल सवाल यह है यह कि जब जीवन में इतना कुछ हो रहा है, तब भी सेंस ऑफ फ़ुलफ़िलमेंट क्यूँ महसूस नहीं हो रहा? इसके जवाब के लिए जरूरी है एक बोध का होना - स्वयंबोध (स्वयं को ठीक से जानना), अपनी उसी पहचान के आधार पर जीवन के मायने गढ़ना और फिर धीरे-धीरे उन्हें हासिल करते हुए जीवन को पूर्ण होते हुए महसूस करना। यही जीवन के सही मायने हैं। इस रास्ते पर आगे बढ़ना सीमितता और स्वीकार्यता के बिना असंभव तो नहीं, लेकिन असहज जरूर है। यही असहजता अस्वीकार्यता और असीमितता को जन्म देती है। इन तीनों के आपस में घुलमिलने से सहज जीवन जीने का विचार एक टास्क बन कर रह गया है। इसलिए अब जीवन सहजता से भोगने का एक मौका न होकर कोई गुत्थी-सा मालूम होता है जिसे सुलझाने के हम निरंतर प्रयत्न तो कर रहे हैं लेकिन उसका कुछ ठोस हासिल नहीं है।